सिरपुर – छत्तीसगढ़ का ऐतिहासिक और पुरातात्विक पर्यटन स्थल

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 सिरपुर छत्तीसगढ़ के महासमुंद जिले में स्थित एक प्रमुख ऐतिहासिक और पुरातात्विक स्थल है । यहां पुरातात्विक विभाग द्वारा खुदाई से कई ऐतिहासिक और पौराणिक स्थल प्राप्त हुए हैं । यह न केवल छत्तीसगढ़ राज्य के लिए ही पर्यटन रूप से महत्वपूर्ण है अपितु इसका अंतरराष्ट्रीय पर्यटन महत्व है । छत्तीसगढ़ की जीवनरेखा नदी महानदी के किनारे यह स्थल विराजमान है । प्राचीन काल में इसका नाम श्रीपुर था और पांचवी शताब्दी के आस पास के समय में यह दक्षिण कौशल (छत्तीसगढ़) की राजधानी थी ।

Sirpur

सिरपुर का इतिहास

सिरपुर की सर्वप्रथम खुदाई 1873-74 में बेगलर द्वारा की गई थी जिसके पश्चात 1881-82 में कनीघम, लौगहर्सट द्वारा 1909-10, एम जी दीक्षित द्वारा 1953-56 में तथा सबसे प्रमुख खुदाई जगपती जोशी और अरुण जोशी द्वारा 1993-2004 में किया गया था ।

सिरपुर की खुदाई से यहां के एक विशाल नगर की उपस्थिति के साक्ष्य मिले हैं जिसके अनुसार सिरपुर की आबादी 40 हजार आस पास की होगी जिसमें हिन्दू, जैन और बौद्ध धर्म के लोगों के उपस्थिति के साक्ष्य मिले हैं । यहां सर्वप्रथम शरभपुरीय शासकों का शासन था ऐसा कई प्रमाण मिलता है । शरभपुरीय शासकों में पहला शासक सुदेवराज के शासन काल में सर्वप्रथम सिरपुर का साक्ष्य मिला है जिसके कौआताल ताम्रपत्र में सर्वप्रथम सिरपुर नगर का प्रमाण मिला है । सिरपुर का अगला साक्ष्य शरभपुरीय शासक प्रवरराज के शासनकाल में मिला है जिसके ठाकुरदीया ताम्रपत्र में सिरपुर का साक्ष्य मिला है । ऐसा माना जाता है कि शरभपुरीय शासन के पश्चात सिरपुर में पांडु वंश का शासन हुआ और इस बीच सिरपुर का आर्थिक और व्यापारिक दृष्टि से विकास प्रारंभ हुआ । यहां अरब देशों से लोग सूरत होते हुए आते थे और उस समय में सूरत व्यापार की दृष्टि से एक महत्वपूर्ण स्थल था । इसके अलावा चीन, मलेशिया, इंडोनेशिया, जावा, सुमात्रा के लोगों का यहां की गतिविधि के साक्ष्य मिले हैं । यहां खुदाई में राजनीतिक और व्यापारिक दृष्टि से शरभपुरीय शासक प्रसन्नमातृ की खंडित स्वर्ण मुद्रा, चीनी शासक काई युवान (713-741ई.) तथा कलचुरी शासनकाल के रत्न के सिक्के मिले हैं । 

सिरपुर के उत्खनन से कई प्रकार के लोगों एवं मवेशियों के हड्डियां, लोहे की कीलें, विहार, सोने के सिक्के, ताम्रपत्र, देवी – देवताओं के प्रतिमा तथा कई मंदिर यहां मिले हैं । यहां अबतक खुदाई से 22 शिव मंदिर, 04 विष्णु मंदिर, 10 बुद्ध विहार, 03 जैन विहार मिल चुके हैं । 

यहां स्थित लोग कृषि, पशु पालन, लोहारी,  आभूषण बनाने का कार्य करते थे । यहां के लोग आयुर्वेद विज्ञान से भी काफी परिचित थे । मिले साक्ष्य के अनुसार यहां से आभूषण, आयुर्वैदिक दवाई तथा सुगंधित चावलों का निर्यात किया जाता था । 

यहां चीनी दार्शनिक ह्वेन टींग ने सातवीं शताब्दी के आस पास यहां की यात्रा किया था तथा सिरपुर से संबंधित कई चीजों का अपने किताब में वर्णन किया था, जिसमें उसने कई प्रकार के बौद्ध विहार का वर्णन अपनी किताब में किया है ।

सर्वप्रथम जब बेगलर ने इस क्षेत्र का मुआयना किया था तब यह क्षेत्र पूरी तरह से वन से आच्छादित था । इस क्षेत्र में बेगलर ने लक्ष्मण मंदिर को सही सलामत खोजा था । इस लक्ष्मण मंदिर को लाल इंटो निर्मित किया गया है और इसे भारत का पहला लाल इंटों से निर्मित मंदिर माना जाता है । सिरपुर के पतन का कई अनेकों वाद दिया गया है । कई लोगों का कहना है कि यह भूकंप के कारण धरती में समा गया तो कई लोगों का यह भी कहना है कि बाहरी आक्रमण के कारण इसका पतन हो गया ।

हिन्दू स्मारक

लक्ष्मण मंदिर

लक्ष्मण मंदिर सिरपुर की सबसे प्रचलित मंदिर है । इसकी खास बात यह है कि यह भारत का अब तक का सबसे पहला लाल ईंटों से निर्मित मंदिर है जिसका निर्माण 7 वीं शताब्दी में हुआ था । इस मंदिर में शिल्प कला का बहुत ही अच्छी तरह से प्रयोग किया गया है । इस मंदिर का गर्भ गृह पूर्व दिशा की ओर खुलती है । इस मंदिर में लगभग सभी ओर नक्काशी दिख जाती है । यह मंदिर दार्शनिक रूप से पूरे भारत में प्रचलित है और इसकी खोज बेगलर ने 1873-74 के खुदाई के समय किया था ।

राम मंदिर

यह मंदिर लक्ष्मण मंदिर से 100 मीटर की दूरी पर लक्ष्मण मंदिर के दक्षिण – पूर्व दिशा में स्थित है ।

गंधेश्वर मंदिर

यह एक शिव मंदिर है जो महानदी के किनारे पर स्थित है । महानदी से इस मंदिर के गर्भगृह के लिए सीढ़ियां गई है । इस मंदिर का स्थापना 8 वीं शताब्दी के आस पास मानी जाती है ।

बालेश्वर महादेव मंदिर

यह महादेव मंदिर तीन मंदिरों का एक समूह है । इन मंदिरों में से एक मंदिर के गर्भगृह में संगमरमर से निर्मित शिवलिंग स्थित है । 

बौद्ध स्मारक

आनंद प्रभु विहार

इसे बौद्ध भिक्षु आनंद प्रभु ने बनवाया था । इसमें एक मुख्य मंदिर और 14 कमरों का मठ सामिल है । इस विहार में कई सिलान्यास भी मिले है । 

स्वस्तिक विहार

यहां बौद्ध काल से संबंधित कई प्रतिमाएं मिली है । 

तीवर देव

यह एक मठ है जो लक्ष्मण मंदिर से करीब 1 किलोमीटर की दूरी में स्थित है । 

जैन स्मारक

यह शिव मंदिर के 100 मीटर के दूरी पर एक जैन बस्ती और मठ के अवशेष मिले हैं । यहां 9 वीं शताब्दी के आदिनाथ (ऋषभ, प्रथम तीर्थंकर) की तस्वीर भी मिली है ।

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