सिंधु – घाटी की सभ्यता

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सिंधु - घाटी की सभ्यता

सिंधु – घाटी की सभ्यता मिस्र और मेसोपोटामिया सभ्यता की भांति ही एक प्राचीन सभ्यता है । इसे सैंधव सभ्यता, हड़प्पा सभ्यता एवं इंडस वेली नाम से भी जाना जाता है । यह आज के नक्शे में पाकिस्तान, अफगानिस्तान और भारत में फैली हुई है । नेचर नामक पत्रिका में छपी शोध आंकड़ों के अनुसार यह सभ्यता लगभग 8000 वर्ष पुरानी सभ्यता है । ऐसा माना जाता है कि यह सबसे ज्यादा विकसित सभ्यता है क्योंकि यहां की नगर की व्यवस्था सुव्यवस्थित और घरें पक्के इंटों से बनी हुई थी । इस सभ्यता में बनें नगरों में घरों से निकलने वाली पानी के निकासी के लिए नाली जैसी उत्तम व्यवस्था पाई गई है । साथ ही अनाज के भंडारण के लिए विशाल अन्नागार के अवशेष भी मिलती है जिससे यह सिद्ध होती है कि यह सभ्यता एक व्यवस्थित सभ्यता थी । 7 वीं शताब्दी के आस पास जब पंजाब प्रांत में रहने वाले लोगों ने खुदाई में ईंट देखकर चकित हो गए और इससे घरों का निर्माण करने लगे । पुरातात्विक विभाग को इस तरह ईंटों के मिलने के पीछे कोई एतिहासिक जगह नीचे दबे होने आशंका हुई । पुरातात्विक विभाग द्वारा खुदाई किए जाने पर इस विशाल सभ्यता की खोज हुई । ईंट मिलने कि घटना के पश्चात सर्वप्रथम सन् 1826 में चार्ल्स मैसेन ने इस सभ्यता की खोज की थी । इसके पश्चात कनिंघम ने 1856 में इस स्थान का खुदाई करवाया था ।

इस सभ्यता को सिंधु सभ्यता, इंडस वेली, हड़प्पा सभ्यता आदि नामों से जाना जाता है तथा प्रत्येक नाम के पीछे एक निश्चित कारण भी है ।  यह सभ्यता सिंधु नदी के किनारे स्थित है जिस कारण से ऐसे सिंधु सभ्यता नाम दिया गया एवं सिंधु को अंग्रेजी भाषा में इंडस कहा जाता था जिस कारण से इसे इंडस वेली नाम दिया गया । हड़प्पा सभ्यता नाम के पीछे का कारण हड़प्पा नामक नगर को इस सभ्यता का केंद्र माना जाने लगा था इसी कारण से इसे हड़प्पा सभ्यता नाम दिया गया ।

खुदाई

जब पंजाब प्रांत में रहने वाले लोगों को जमीन के अंदर के ईंट मिलने लगे । इस स्थल का सर्वप्रथम मुवायना 1826 में चार्ल्स मैसेन ने किया । इसके पश्चात 1856 में कराची और लाहौर के मध्य रेल लाइन बिछाने के दौरान बर्टन बंधुओं को भी यहां ऐसे ही कुछ चीजें मिली जिसकी सूचना इन्होंने सरकार को दे दी । इसके पश्चात अलेक्जेंडर कनिंघम इस स्थल का मुवायना किया और 1861 में अलेक्जेंडर कनिंघम के द्वारा भारत में पहला पुरातात्विक विभाग की स्थापना की गई । 1902 में लार्ड कर्जन द्वारा जॉन मार्शल को भारतीय पुरातात्विक विभाग का महानिदेशक बनाया गया। इस सभ्यता के बारे में लिखने वाला प्रथम व्यक्ति फ्लिट था मगर तब इस विशाल सभ्यता का उजागर नहीं हो पाया था ।

इस स्थल का सर्वप्रथम खुदाई 1920 -21 में हुई जहां इंटों के अलावा कई अनेक अवशेष प्राप्त हुए । इसी खुदाई के दौरान 1921 में दयाराम साहनी ने इस सभ्यता से संबंधित हड़प्पा नामक नगर की खोज की । इसी कारण से इस सभ्यता को हड़प्पा सभ्यता भी कहा जाता है । इस नगर को खुदाई पाकिस्तान के पंजाब प्रांत में मोंटगोमरी जिले में रावी नदी के तट पर की गई एवं खुदाई से बैलगाड़ी, अन्नागार और बलुआ पत्थर से निर्मित मानव प्रतिमा मिली ।

1922 में इस सभ्यता का एक और नगर की खोज राखलदास बेनर्जी द्वारा की जो मोहनजोदड़ो के नाम से जानी जाती है । इस स्थल को मृतकों का टीला भी कहा जाता है क्योंकि सिंधी भाषा में मोहनजोदड़ो का मतलब मुर्दों का टीला होता है । मोहनजोदड़ो में खुदाई से अनेक चीजें मिली जैसे बुनी हुई कपड़े, दाढ़ी वाले मनुष्य की प्रतिमा, स्नानागर, अन्नागार, कांस्य की बनी नर्तकी की प्रतिमा,  पशुपति महादेव की प्रतिमा इत्यादि । इस सभ्यता के ज्ञान से खुदाई रुकी नहीं बल्कि लंबे समय तक चलती रही और एक के बाद एक अनेक नए नगरों की खुदाई होती रही ।

1929 में स्टीन द्वारा सुत्कागेंडोर की खोज की गई । सुत्कागेंडोर इस नगर में मिले अवशेषों से यह पता चलता है कि यह व्यापारिक केंद्र स्थल है ।  वर्तमान में पाकिस्तान के दक्षिण-पश्चिमी राज्य बलूचिस्तान में दाश्त नदी के किनारे पर स्थित है।
1931 में चन्हूदड़ो की खोज एन. जी. मजूमदार द्वारा सिंधु नदी के तट पर सिंध प्रांत में की गई । चन्हूदड़ों में मनके बनाने कि सामग्री एवं बिल्ली का पीछा करते हुए कुत्ते का पदचिन्ह मिला है ।
1935 में आमरी नामक स्थल की खोज एन. जी. मजूमदार द्वारा ही सिंध नदी के तट पर की गई । इस स्थल से हिरण के साक्ष्य मिले हैं ।
1953 में कलीबंघा की खोज राजस्थान के घग्गर नदी के किनारे घोष द्वारा की गई । इस स्थल से अग्नि वेदिकाएँ, ऊंट की हड्डियाँ, लकड़ी का हल आदि अवशेष प्राप्त हुए ।
1953 में ही आर. राव द्वारा लोथल की खोज गुजरात के भोगवा नदी के किनारे की गई । यहां से मानव निर्मित बंदरगाह, गोदीवाडा, चावल की भूसी, अग्नि, वेदिकाएं, शतरंज का खेल आदि का अवशेष मिला है ।
1964 में जे. पी. जोशी ने सुरकोतदा की खोज वर्तमान के गुजरात क्षेत्र में की जहां से घोड़ों के अवशेष प्राप्त हुए हैं ।
1974 में आर. एस. विष्ट द्वारा बनवाली की खोज हरियाणा के हिसार जिले में की । यहां से हड़प्पा पूर्व और हड़प्पा संस्कृतियों के साक्ष्य मिले हैं एवं इसके अलावा मनके और जौ प्राप्त हुए हैं ।
1985 में आर. एस. विष्ट द्वारा ही धौलावीरा नामक स्थल की खोज की गई एवं यहां से जल कुंड एवं जल निकासी की उत्तम व्यवस्था मिली है ।
ये कुछ प्रमुख  नगर थे इनके अलावा भी खुदाई से कई अनेक स्थल एवं अवशेष प्राप्त हुए हैं ।

नगरीय विन्यास

सिंधु घाटी की सभ्यता अपनी नगरीय विन्यास के कारण से पूरे विश्व में प्रचलित है । नगर की उत्तम व्यवस्था के कारण ही इसे सुव्यवस्थित सभ्यता कहा जाता है । यहां नगरीय विन्यास में पानी के निकालने की उत्तम व्यवस्था, विशाल स्नान गार, अन्नागार तथा सड़कों का एक दूसरे को 90° अथवा समकोण में काटती है यह व्यवस्था अत्यंत प्रचलित है । यहां की दो प्रसिद्ध नगरों मोहनजोदड़ो और हड़प्पा दोनों स्थल में विशाल दुर्ग स्थित हैं जहां उच्च वर्गीय लोग निवास करते थे । इसके अलावा सामान्य लोगों के लिए ईंटों से निर्मित अलग से घर होता था । इस सभ्यता के घरों के निर्माण के लिए पक्के ईंटों का प्रयोग किया गया था ।

यहां अनाज के संग्रहण के लिए विशाल अन्नागार भी बनाए गए थे जहां अनाज का भंडारण किया जाता था । इन अन्नगारों को कोठार कहा जाता था जिसकी संरचना 15.23 मीटर लंबा और 6.09 मीटर चौड़ा होता था । मोहन जोदड़ो की सबसे बड़ा संरचना है – अनाज रखने का कोठार, जो 45.71 मीटर लंबा और 15.23 मीटर चौड़ा है। हड़प्पा के दुर्ग में छः कोठार मिले हैं जो ईंटों के चबूतरे पर दो पांतों में खड़े हैं। हड़प्पा के कोठारों के दक्षिण में खुला फर्श है और इसपर दो कतारों में ईंट के वृत्ताकार चबूतरे बने हुए हैं। फर्श की दरारों में गेहूँ और जौ के दाने मिले हैं। इससे प्रतीत होता है कि इन चबूतरों पर फ़सल की दवनी होती थी। हड़प्पा में दो कमरों वाले बैरक भी मिले हैं जो शायद मजदूरों के रहने के लिए बने थे।  विशाल स्नानागार का विन्यास भी अत्यंत सुव्यवस्थित है । स्नानागार के दोनों ओर सीढ़ी बनाई गई है तथा कपड़े बदलने के लिए किनारे में अलग से कमरे बने हुए हैं । यह स्नानागार 11.88 मीटर लंबा, 7.01 मीटर चौड़ा और 2.43 मीटर गहरा है तथा इसका फर्श पक्की ईंटों का भी बना हुआ है । इस स्नानागार के पास में कुआं बना हुआ है जिससे पानी हौज में डाला जाता है । अतिरिक्त अर्थात व्यर्थ जल के निकासी के लिए निर्गम द्वारा होता है जहां से जल बाहर निकलकर नाली मे चला जाता है । यहां निर्मित नाली सुव्यवस्थित ढंग से बने हुए हैं और लगभग सभी घरों से पानी इन नालियों द्वारा ही निस्तारित किया जाता था । लगभग सभी घरों में स्नानागार होते थे जिनके पानी का भी निस्तारण इन्हीं नालियों द्वारा किया जाता था । ये नालियां ईंटों अथवा पत्थरों से ढंकी हुई थी ।

धार्मिक जीवन

 खुदाई से प्राप्त अवशेषों से यह साबित होता है कि यहां के लोग पूजा – पाठ में भी विशेष रुचि रखते थे । यहां खुदाई से एक मूर्ति मिली है जिसमें स्त्री के गर्भ से एक पौधा निकला हुआ है । कई विशेषज्ञों ने इसकी तुलना धरती पर उसपर उगे पेड़ – पौधों से की है। साथ ही विशेषज्ञों का मानना है कि तब लोग धरती माता कि पूजा करते थे इसी कारण से ऐसे मूर्ति प्राप्त हुई है ।

खुदाई से एक अद्भुत सील प्राप्त हुई है जिसमें 3-4 मुख वाले एक योगी का चित्र बनाया गया है । विशेषज्ञों का मानना है कि ये भगवान शिव का चित्र है । धौलाविरा में एक कुआं में सीढ़ी पर उतरने पर एक जगह पर दीपक जलाने का स्थान मिलता है और इस कुएं का पानी सरस्वती नदी से आती है इसलिए ऐसा माना जाता है कि लोग सरस्वती माता का भी पूजा करते थे । लोथल तथा कालीबंगा जैसे प्रचलित नगरो में हवन कुंड के अवशेष मिले है जिससे यह साबित होता है कि वहां के लोग वैदिक थे । सिंधु सभ्यता के खुदाई करने पर आबादी कि तुलना में काफी कम मात्रा में कब्र मिले हैं इससे यह संकेत तो मिलती है कि यहां विभिन्न धर्म के लोग निवास करते थे साथ ही यहां मृत व्यक्ति को जलाया भी जाता था । यहां खुदाई से ढेर सारी नारी प्रतिमा मिली है जिससे यह कल्पना की जाती है कि उस समय में लोगों द्वारा नारियों को एक विशेष स्थान दिया जाता था साथ ही देवी पूजा में लोग विश्वास रखते थे । 

यहां कई तरह के धार्मिक वस्तुवें मिली है पर कहीं भी मंदिर का कोई भी अवशेष प्राप्त नहीं हुआ है । मोहनजोदड़ो की खुदाई से एक ऐसा मुहर प्राप्त हुआ है जिसपर तीन मुख वाले एक योगी ध्यान में बैठे हुए हैं तथा उनका तीन सिंग है । उनके बाईं ओर एक भैसा और एक गेंडा है जबकि दाईं ओर एक हाथी और एक बाघ स्थित है साथ ही साथ आसान के नीचे दो हिरण बैठे हुए हैं । कई मतों के अनुसार ये भगवान पशुपति महादेव का स्वरूप है । 

यहां से पशु – पूजा से संबंधित कई प्रकार के अवशेष प्राप्त हुए हैं इसमें सबसे खास एक सिंग वाला पशु है । अभी तक कोई प्रमाणित मत नहीं मिला है कि यह पशु कौन सा है मगर रूपरेखा के आधार पर ऐसे एक गेंडा अथवा यूनिकॉर्न कहा जा रहा है । खुदाई से कई ऐसे मुहर प्राप्त हुए हैं जिसपर कूबड़ वाले वृषभ का अंकन है इससे तुलना भगवान शिव के वाहन नंदी से की जाती है और ऐसा माना जाता है कि संभवतः इसकी पूजा भी की जाती रही होगी । फाख्ता नामक एक पक्षी की भी यहां पूजा की जाती थी ।

यहां के लोग जादू – टोना और अंधविश्वासों पर भी विश्वास करते थे ।

व्यवसाय

यहां के लोग कृषि, व्यापार, पशुपालन तथा छोटे – मोटे उद्योग धंधों का व्यवसाय करते थे । यहां से शिल्प कला के भी प्रमाण मिले हैं संभवतः यहां के लोग शिल्प कला में भी पारंगत थे ।

कृषि

यहां विभिन्न प्रकार के अनाज एवं अन्नागार के अवशेष मिले हैं इससे इस बात को प्रमाण मिलता है कि यहां के लोग खाद्य आपूर्ति के लिए कृषि करते थे । यहां मिले अवशेषों के अनुसार सिंधु सभ्यता के लोग  गेंहू, जौ, राई, मटर, ज्वार, तिल, सरसों तथा कपास की खेती करते थे । यहां के लोग दो किस्म के गेंहू और जौ की खेती करते थे एक तो सामान्य तथा एक उन्नत किस्म की । बनवाली में मिला जौ अन्य क्षेत्रों की तुलना में उन्नत किस्म की थी ।

यहां के लोग पशुपालन करते थे इससे यह संभव हो सकता है कि कृषि योग्य भूमि की जुताई में पशुओं का उपयोग होता था । प्राचीन कृषि परंपराओं में खेत जुताई के लिए पशुओं की सहायता ली जाती थी । यहां किसी तरह के फावड़ा जैसे औजारों के अवशेष तो प्राप्त नई हुए है मगर कालीबंगा में कूँट (हलरेखा) प्राप्त हुए हैं जिससे खेत जुताई का प्रमाण मिलता है ।

यहां की भूमि उपजाऊ और कृषि के लिए उत्तम थी, इस बात को प्रमाण 4 थी ई. पू. में सिकंदर के एक इतिहासकार ने कहा था कि सिंध को उपजाऊ भूमि वाले क्षेत्रों में गिना जाता है । कई विशेषज्ञों का मानना है कि यहां के उपजाऊ भूमि का कारण सिंधु नदी पर प्रतिवर्ष आने वाला बाढ़ है । विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि वहां के लोग बाढ़ के उतर जाने के बाद नवंबर के महीने में बाढ़ वाले मैदानों में बीज बो देते थे और अगली बाढ़ के आने से पहले अप्रैल के महीने में गेहूँ और जौ की फ़सल काट लेते थे। 

पशु – पालन

यहां से कई तरह के पशुओं के अवशेष मिले हैं जिससे यह प्रमाणित होता है कि वहां के लोग पशु पालन में विशेष रुचि रखते थे । उन्हें पशुओं से दूध की प्राप्ति होती थी साथ की कृषि के लिए भी पशुओं का उपयोग करते थे । इसके लिए वे पशुओं का किस तरह उपयोग करते थे इसका कोई प्रमाण तो नहीं मिला मगर कई लोगों का मानना है कि वे लोग मांस के लिए भी पशुओं पर आश्रित रहते थे । इसके अलावा वहां पशुबली भी देते थे ।

वहां गाय, भैंस, भेड़, बकरी, बैल, कुत्ते, बिल्ली, मोर, हाथी, शुअर, बकरी व मुर्गियाँ आदि पशुओं को पाला जाता था ।

संदर्भ

  1. https://hi.m.wikipedia.org/wiki/%E0%A4%B8%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A7%E0%A5%81_%E0%A4%98%E0%A4%BE%E0%A4%9F%E0%A5%80_%E0%A4%B8%E0%A4%AD%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%A4%E0%A4%BE
  2. https://www.studyfry.com/sindhu-ghaatee-sabhyata-ka-dhaarmik-jeevan

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