परवल [ वैज्ञानिक नाम, उत्पादन, औषधीय महत्व, फायदे]

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वैज्ञानिक नाम (Scientific Name) – ट्राइकोसेन्थेस डायोइका (Trichosanthes dioica)

वैज्ञानिक वर्गीकरण

जगत (Kingdom) – प्लांटी (Plantae)

वर्ग (Class) – ट्रकियोफाइटेस Tracheophytes

कुल (Order) – कुकुरबिटेल्स (Cucurbitales)

गण (Family) – कुकुरबिटेसी (Cucurbitaceae)

जाति (Genus) – ट्राइकोसेन्थेस (Trichosanthes)

परवल जिसका वैज्ञानिक नाम “ट्राइकोसेन्थेस डायोइका” है, भारत का एक सब्जी है । यह फल परवल के लता में लगती है । यह एक बहुवर्षीय पादप है इसकी खेती भारत के कई क्षेत्रों जैसे – छत्तीसगढ़, ओडिशा, बंगाल, उत्तर प्रदेश और बिहार आदि जगहों में होती है ।

यह 5-15 सेमी बेलनाकार फल होता है जिसका रंग सुरुवाती में हल्का हरा तथा बाद में गहर हरा हो जाता है । इसपर हल्का हरा अथवा सफेद रंग की धारियां होती है । इसकी बाहरी संरचना एक तरबूज जैसे दिखती है मगर इसका आकार तरबूज के तुलना में बहुत छोटी होती है । इसका सतह खुरदुरा होता है तथा इसपर छोटे छोटे रोम पाए जाते हैं ।

यह आमतौर पर लगभग सभी बाजारों में मिलते हैं जिस राज्य में इसका उत्पादन होता है । बहुवर्षीय पादप होने के कारण किसानों को यह लंबे समय तक सब्जी देता है । इसकी खेती खास तौर पर उन क्षेत्रों में किया जाता है जहां पानी प्रचुर मात्रा में होती है । इसकी खेती नदी किनारों में तथा उन क्षेत्रों में किया जाता ही है जहां वार्षिक औसतन बारिश 1500-2000 सेमी होती है ।

इसका जड़ कंद होता है जिसका उपयोग नई फसल उगते समय भी की जाती है । बीज तथा कंद दोनों से इसका पौधा उगता है मगर खेती में इसका कंद का ज्यादा उपयोग किया जाता है । 

सामान्य नाम

इसका सामान्य नाम परवल ( नेपाली, हिंदी, गुजराती), पोटल (ओड़िया, बंगाली, तेलगु), पर्बल (पंजाबी), कंबुपुड़ालाई (तमिल), पोरल (मगही), परोर (मैथिली), पॉइंटेड गार्ड ( अंग्रेजी) आदि ।

परवल का उत्पादन

परवल की खेती कई विधियों द्वारा होती है । लोग अपने अपने सुविधानुसार अथवा पारंपरिक खेती करते हैं । पारंपरिक खेती में फसल उगाने से पहले ज्यादातर किसान विभिन्न प्रकार के एंटीफंगल और बीज स्वस्थ करने अथवा दीमक से बचाव के लिए विभिन्न दवाइयों का उपयोग नहीं करते । परवल की खेती, परवल के बीज से ना करके परवल के पौधे के कंद से अथवा इसके लता को काटकर, गन्ने की खेती की भांति इसकी खेती की जाती है ।

परवल की फसल मख्यतः गड्ढा विधि, नाली विधि, गमला / गार्डन विधि आदि विधियों द्वारा किया जाता है ।

[1] गड्ढा विधि –

इस विधि में सबसे जरूरी चीज होता है परवल का कंद/ कंदमूल जिसको दूसरे परवल के फसल के फसल समाप्त होने के बाद उसकी कंद को खोदकर लाया जाता है । इसमें आप कंद को पहले आप छोटे छोटे पॉलीथिन में अथवा गड्ढे में सीधा दोनों विधियों द्वारा उगा सकते हैं ।

गड्ढा की गहराई 15 – 25 सेमी. तक रखा जाता है लंबाई तथा चौड़ाई 15×15 सेमी अथवा ज्यादा रख सकते हैं ।

इस गड्ढे में परवल के कंद को सीधा रखते हैं और ध्यान रखते हैं की परवल की लता वाली भाग ऊपर रहे और लता के ऊपर वाले भाग को थोड़ा छोड़कर अन्य भाग को ढंक दिया जाता है । किसान चाहें तो इसे उगाने से पहले उचित दवाइयों द्वारा उपचारित कर सकते हैं तथा मिट्टी में फर्टिलाइजर का प्रयोग कर सकते हैं ।

अगर पौधा पहले से पॉलीथिन में तैयार हो गई है तो इसे इन गड्ढों में उगा सकते हैं । परवल के लता के सहारे के लिए अंकुरण के पश्चात बहुशाखित सूखा लकड़ी अथवा विभिन्न लकड़ियों में तार बांधकर किया जा सकता है । 

दो गड्ढे की बीच 2-3 फीट की दूरी रखनी चाहिए ।

[2] नाली विधि

इस विधि में गन्ने की खेती के लिए तैयार की जाने वाली नालियों की भांति 15-20 सेमी गहरी कई नलिया बनाई जाती हैं दो नालियों की बीच बीच की दूरी 3-4 फीट या अधिक रखी जाती है ।

अब पॉलीथिन में तैयार परवल के पौधे को अथवा कंद को एन गड्ढों में 15-20 सेमी दूरी पर एक एक कंद अथवा पौधा उगाया जाता है । इस विधि में भी अगर कंद को सीधे उगाने पर उसके लता वाले भाग अथवा जिस ओर तथा उगेगी उस भाग को छोड़कर अन्य भाग को मिट्टी से ढंक दिया जाता है ।

इस विधि का उपयोग आसान माना जाता है क्योंकि पौधे के सहारा के लिए लकड़ी अथवा तार या जाली लगाना आसान होता है ।

[3] गमला / गार्डन विधि

इस विधि द्वारा परवल की फसल गमला अथवा गार्डन में आसानी से उगाया जा सकता है । इसमें परवल के कंद को गमले में तथा गार्डन में गड्ढे बना कर किया जाता है ।

याद रखें – गड्ढा अथवा नाली विधि में जब लता 20-25 सेमी ऊंची हो जाती है तब इसमें खाद की उचित मात्रा देकर फसल जड़ वाले भाग में मिट्टी चढ़ाया जाता है । समय समय पर इसके खरपतवार की सफाई करनी भी जरूरी है और इसके लिए सिंचाई नियमित समय में करते रहें ।

पौधे का सहारा

परवल एक लता वाला फसल है ऐसे भी अगर लता को किसी सहारा द्वारा भूमि के ऊपर रखा जाता है यदि लता को को भूमि पर रहने देने पर परवल के खराब होने की संभावना रहती है । जमीन में लता का फैलाव अनियमित होता है जिससे खेती में दिक्कत आ सकती है । स्वस्थ खेती के अन्तर्गत परवल के लता को सहारा देकर खड़ा रखा जाता है । इसके लिए ऐसे लकड़ी का चुनाव किया जाता है जो झाड़ीदार हो जैसे की बांस का कुछ झाड़ीदार तना ये बिना पैसे खर्च किए सहारा बनाने का तरीका है इसमें बांस के झाड़ीदार तने को विभिन्न भाग में काटकर परवल के लता के पास गाड़ दिया जाता है और परवल की लता को इसमें चढ़ने दिया जाता है । इसमें बांस के अलावा अन्य झाड़ीदार लकड़ी का उपयोग किया जाता है तथा कटिंग झाड़ीदार लकड़ी की ऊंचाई 6-7 फीट ऊंची रखी जाति है ।

इसके अलावा नाली प्रकार वाले विधि में हर नाली पर जाली लगाई जाती है अथवा लकड़ी गाड़कर तार बांध दिया जाता है जिसमें परवल की तला ऊपर चढ़ती है । यह दूसरा तरीका खर्चीला तरीका होता है ।

औषधीय महत्व और फायदे

इसमें विटमिन ए, विटामिन – बी1 , विटामिन – बी 2 और विटामिन – सी पाई जाती है इसके अलावा कैल्शियम पाया जाता है जो विभिन्न प्रकार के औषधीय उपयोगी होती है ।

1. इसके पत्तों को पीसकर बाल में लगाने से बाल झड़ने की समस्या में फायदा होता है ।

2. इसके पत्तों को पीसकर लेप लगाने से फोड़े, फुंसी और त्वचा संबंधी परेशानियों में लाभ होता है ।

3. इसके बीज तथा पत्तियों का उपयोग सिरदर्द अथवा अन्य दर्द के उपयोग में किया जाता है ।

4. परवल में एंटीऑक्सिडेंट पाया जाता है जो बढ़ती उम्र के दाग़, झुर्रियों में लाभदायक होता है ।

5. शरीर में रोग प्रतिरोधी शक्ति बढ़ाता है इसके अलावा रक्त को शुद्ध करता है और चेहरे को कान्तिमय बनाता है ।

6. सर्दी, खांसी और बुखार में आराम देता है ।

7. कोलेस्ट्रॉल नियंत्रण तथा कब्ज समस्या में लाभदायक होता है, गैस समस्या दूर करने तथा पाचन क्रिया को बढ़ाता है ।

8. कड़वे परवल की पट्टी को पीसकर पानी के साथ पीने पर उल्टी होती है जिससे पेट की विष उल्टी के साथ बाहर आ जाती है ।

9. मीठे परवल की पत्तियों तथा टहनी को 6 ग्राम सोंठ के साथ काढ़ा बनाकर शहद के साथ लेने पर सूखा कफ तथा कफ ज्वर में लाभ होता है ।

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