धान – भारत के प्रमुख भोजन का स्त्रोत

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धान ही वह फसल है जिससे देश के अधिकतम अनाज की आपूर्ति की जाती है । धान से ही चावल का निर्माण होता है जिसे न केवल भारत में बल्कि भारत के अलावा अन्य देशों में भी बड़े चाव से खाया जाता है । धान को ही चावल कह सकते हैं क्योंकि चावल के ऊपर में एक परत होती है तब वह धान कहलाता है और यदि उस परत को हटा दें तो यह चावल कहलाती है ।

वैज्ञानिक नाम – ओराय्ज़ा सैटिवा

चावल/धान का उत्पादन भारत में अन्य देशों की तुलना में बहुत अधिक होती है ।  दरअसल चावल और धान एक ही होता है। जब अनाज पौधे में लगा होता है तब चावल के चारों ओर एक आवरण होता है तब ऐसा आवरण युक्त चावल धान कहलाता है । इस धान के बाहरी आवरण को मशीन द्वारा हटाकर शुद्ध चावल प्राप्त किया जाता है । धान से चावल निकालने की प्रक्रिया कई हजार वर्षों से चली आ रही है । प्राचीन काल में मशीन नहीं होने के बावजूद भी लोग देशी तरीकों से यह काम करते थे ।

विश्व में भारत धान/चावल उत्पादन की लिस्ट में प्रथम नंबर पर है । गांव से संबंधित अधिकतर लोगों के पास कृषि योग्य पर्याप्त भूमि होता है जिसमें वे तरह तरह के फसल उगाते हैं इसमें धान सामिल है । भारत में छत्तीसगढ़ राज्य को धान का कटोरा कहा जाता है क्योंकि इस राज्य में अधिकतम लोग धान की खेती करते हैं और इस राज्य की धान की पैदावार बहुत ही ज्यादा होती है । धान की खेती रबी तथा खरीफ दोनों द्वारा की जाती है इस कारण से इसकी पैदावार बहुत ज्यादा होती है ।

धान की किस्में / प्रजातियां

धान की 1-2 नहीं बल्कि उत्पादन की दृष्टि से अनेकों किस्में विकसित की जा चुकी है । धान की पैदावार को बढ़ाने के लिए अनेकों किस्म की खोज लगातार की जा रही है । मगर हर प्रकार सभी भूमि पर नहीं उगाई जा सकती । धान की फसल मृदा की गुणवक्ता के आधार पर उगानी चाहिए । धान की निम्न किस्मों का भारत में खेती की जाती है – नरेन्द्र-118, नरेन्द्र-97, साकेत-4, बरानी दीप, शुष्क सम्राट, नरेन्द्र लालमनी, पूसा-169, नरेन्द्र-80, पंत धान-12, मालवीय धान-3022, नरेन्द्र धान-2065 और मध्यम पकने वाली किस्मों में पंत धान-10, पंत धान-4, सरजू-52, नरेन्द्र-359, नरेन्द्र-2064, नरेन्द्र धान-2064, पूसा-44, पीएनआर-381, नरेन्द्र ऊसर धान-3, नरेन्द्र धान-5050, नरेन्द्र ऊसर धान-2008, नरेन्द्र ऊसर धान-2009 आदि । इनके अलावा भी ढेर सारी धान कि ऐसी किस्में हैं जिनका उपयोग खेती के लिए आज भी की जाती है ।

खेती / उत्पादन

धान की खेती पारंपरिक तथा वैज्ञानिक दोनों विधियों द्वारा रबी तथा खरीफ दोनों में की जाती है । कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि खेती के लिए उचित धान किस्म का चयन कृषि योग्य भूमि के आधार पर करना चाहिए क्योंकि भूमि की उपजाऊ शक्ति कम ज्यादा, पानी की उपलब्धता आदि चीजें फसल को प्रभावित करती है ।

बीज का चयन

आप कृषि योग्य भूमि के आधार पर उचित बीज का चयन कर लें । बीज चयन में अगर कोई परेशानी होती है तो आप किसान कॉल सेंटर पर निशुल्क कॉल करके उनसे सलाह प्राप्त कर सकते हैं । धान की उचित बीज का चयन नहीं करने पर फसल की पैदावार कम हो सकती है ।

बीज का उपचार

फसल को विभिन्न रोगों से बचाने के लिए पहले से ही बीज को विभिन्न दवाइयों द्वारा उपचारित कर लेना सही होता है इससे विभिन्न तरह के रोग लगने की संभावना कम हो जाती है और पैदावार बढ़ने की संभावना होती है । उपचार की विधि में कई प्रक्रियाएं होती हैं जिसमें से कुछ जरूरी होती है जबकि कुछ कम जरूरी । जिन रोगों की फसल में लगने की संभावना अधिक होती है उससे बचाव के लिए उस रोग निरोधी उपचार आवश्यक होती है ।

सबसे पहले एक बड़े बर्तन में 10 लीटर पानी लें और इसमें तब – तक नमक डालें जब तक इसमें अंडा या आलू तैरने न लगे । यदि अंडा या आलू इस घोल में डूब जाता है तो इसमें और अधिक नमक डालें । जब अंडा या आलू इस घोल में तैरने लगे तो इस घोल में धीरे – धीरे करके धान को डालें । जो धान एक घोल में तैरने लगे उसे हटा दें और जो धान इसमें सही तरह से डूबा हो उसे खेती के उपयोग में लाएं । इस प्रक्रिया द्वारा 5-6 बार ही एक घोल का धान के सोधन के लिए प्रयोग करें उससे अधिक बीज के सोधन के लिए नया घोल तैयार कर लेवें ।

अब बीज के फफुंदनाशी घोल का तैयारी करना है तथा बीज को उपचारित करना है ।  3 ग्राम फफुंदनाशक का प्रति किलो बीज में मिलाकर अथवा 3 ग्राम बैविस्टिन फफूंदनाशक को प्रति किलो बीज के उपचार हेतु प्रयुक्त कर सकते हैं । ये दोनों उपचार की प्रक्रिया आवश्यक प्रक्रिया है जिसे बीज के उपचार में उपयोग में लाना चाहिए । इसके पश्चात बीज का अंकुरण करना चाहिए ।

बीज का अंकुरण

इस उपचारित बीज को एक गीले रेशे वाले बोले में भरकर पैरे से ढंक दें । ध्यान रहे कि प्लास्टिक बोरे में बीज को न डालें केवल रेशे वाले बोरे का उपयोग करें । 24 घंटे के पश्चात से बीज में अंकुर दिखने लग जाएंगे । यदि बीज को उपचारित नहीं किए हैं तो बीज को कुछ घंटे पानी में भिगोकर रखें उसके पश्चात गीले बोरे में डालें । 1-2 दिन में बीज का अच्छा अंकुरण हो जाएगा जो बुवाई अथवा नर्सरी के लिए तैयार है ।

भूमि तैयार / मृदा उपचार

भूमि को खेती के लिए प्रयुक्त करने से पहले फसल के लिए आवश्यक पोषक तत्वों को आपूर्ति हेतु खेत में खाद का छिड़काव करना चाहिए । भूमि को जोतने से पहले भूमि में अपने अनुसार देशी खाद का छिड़काव कर लेना चाहिए । यह आवश्यक नहीं है मगर अच्छी पैदावार के लिए यह करना चाहिए । खाद के छिड़काव के कुछ दिनों पश्चात खेत की जुताई कर सकते हैं ।

जुताई

कृषि योग्य चयनित भूमि को 2-3 बार अच्छे से जुटाई कर लें ताकि ऊपरी कृषि योग्य भूमि का मृदा कठोर न रहे और फसल के अनुकूल हो जाए । अगर भूमि सूखा है तो मिट्टी के भुरभुरा होने तक जुटाई करें ।

नर्सरी तैयार / बुवाई

फसल को दो विधियों द्वारा उगाया जा सकता है एक सीधा खेत में बुवाई करके तथा दूसरा नर्सरी तैयार करके । नर्सरी विधि में खेत की जुताई की पश्चात एक चयनित भूमि में बीज का सघन मात्रा में बुवाई करते हैं तथा 15 से 20 दिनों के अंदर नर्सरी में पौधा उगाने के लिए उपयुक्त हो जाता है । यदि आवश्यकता हो तो नर्सरी में आवश्यक तत्वों का छिड़काव कर लेवें । जब नर्सरी का पौधा उगाने हेतु अनुकूल हो जाता है तब इसे जड़ सही उखाड़ लिया जाता है और इसे उखाड़ते समय इस बात को ध्यान रखा जाता है कि इसका जड़ टूटे नहीं । जड़ के टूटने से बचाव के लिए इस नर्सरी को कुछ पानी दिया जाता है ताकि पौधे आसानी से उखड़ जाएं । अब ये दूसरे खेत में उगाने के लिए तैयार हो गए हैं । अब इन पौधों को दूसरे उपयुक्त खेत में ले जाकर क्रमबद्ध रूप से कतार में 20-25 सेमी. की दूरी पर उगाया जाता है । यह विधि सीधे बुवाई विधि से थोड़ी महंगी है मगर इस विधि में पैदावार सीधे बुवाई विधि की तुलना में कई गुना अधिक होती है तथा इसमें घांस – फुस की निंदाई की जरूरत नहीं पड़ती । साथ ही इन फसल का विकास अच्छे से होता है ओर पैदावार  अच्छी होती है ।

सीधे बुवाई में बीज को कृषि योग्य तैयार भूमि में सीधे छिड़काव कर दिया जाता है और इस बात का ध्यान दिया जाता है कि बीज एक दूसरे से ज्यादा पास – पास में न हों । पास – पास में होने पर पौधों का विकास सही से नहीं हो पाता जिस कारण से पैदावार कम होने कि संभावना होती है । यह कृषि की सस्ती विधि होती है क्योंकि ऐसे दोबारा से उखाड़कर उगाया नहीं जाता । लेकिन इस विधि में निंदाई की अति आवश्यकता होती है क्योंकि बीच – बीच में खरपतवार उग आते हैं जो पैदावार को कम कर देते हैं ।

फसल कटाई / मिसाई

90 -120 दिनों के अंदर फसल तैयार हो जाता है और धान के पकने के पश्चात यह कटाई के लिए उपयुक्त हो जाती है । प्राचीन कृषि में यह प्रक्रिया बहुत लंबी होती थी क्योंकि कटाई तथा मिसाई की प्रक्रिया हाथों तथा बैल अथवा ट्रैक्टर से की जाती थी । इसमें प्राप्त धान में फसल के पैरे रह जाते थे जिसे पंखा द्वारा साफ किया जाता था । इस तरह पहले यह प्रक्रिया काफी लंबी थी । अभी भी कई जगहों में इस विधि का प्रयोग किया जाता है मगर अधिकतर लोगों ने आधुनिक विधियों को अपना लिया है जिसमे आधुनिक उपकरणों का उपयोग किया जाता है । आधुनिक विधियों में तीन तरीकों से फसल की कटाई एवं मिसाई होती है जो निम्न है –

(1) हाथ से कटाई तथा मशीन से मिसाई ।
(2) मशीन से कटाई तथा मशीन से मिसाई (अलग – अलग) ।
(3) एक बार में ही मशीन से कटाई एवं मिसाई ।

(1) हाथ से कटाई तथा मशीन से मिसाई – इस विधि में लोग फसल की अपने हाथों से कटाई करते हैं उसके पश्चात फसल को एक जगह इकट्ठा रखकर थ्रेसर मशीन के द्वारा इसकी मिसाई की जाती है ।

(2) मशीन से कटाई तथा मशीन से मिसाई (अलग – अलग) – इस विधि में धान की कटाई मशीन द्वारा की जाती है तथा इसे भी सूखने के पश्चात एक जगह पर एकत्रित करके थ्रेसर मशीन के द्वारा इसकी मिसाई की जाती है ।

(3) एक बार में ही मशीन से कटाई एवं मिसाई – इस विधि में एक बार में ही खड़ी फसल को हार्वेस्टर मशीन के द्वारा कटाई एवं मिसाई करा ली जाती है । इस विधि में कटाई एवं मिसाई में कम समय लगता है इस कारण से यह विधि अन्य विधियों की तुलना में महंगी होती है ।

मंडी में बेचना

जो किसान खेती को एक व्यवसाय के रूप में करते हैं वे मुख्यत अपने पैदावार का कुछ हिस्सा अपने पास रखकर शेष मंडी में बेच देते हैं । इस फसलों की खरीदी सरकार द्वारा की जाती है और किसानों को अपने फसल की कीमत सरकार द्वारा मिल जाती है ।

धान से चावल प्राप्त करना

धान से चावल प्राप्त करने के लिए एक खास तरह की मशीन का उपयोग किया जाता है जिसमें धान को डालने पर चावल और भूषा अलग हो जाती है । चावल का उपयोग लोग भोजन के रूप में करते हैं और भूषा भी मवेशियों के चारा के रूप में उपयोग में लाई जाती है ।

किसानों को होने वाली समस्या

कृषि का व्यवसाय इतना आसान भी नहीं है जितना कि लगता है । कई बार मौसम और रोगों के कारण से किसान का फसल बर्बाद हो जाती है । जिस कारण से किसानों को बहुत ज्यादा नुकसान होता है और उन्हें खेत में लगे दवाई तक के पैसे भी वापस नहीं मिल पाता । खेत में हुई नुकसान के कारण से कई किसान आत्महत्या कर लेते हैं । किसानों की बढ़ती आत्महत्या यह साबित करती है कि किसानों पर नुकसान कितना भारी पड़ता है ।

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